Tuesday, 9 April 2013

`दीवार` - श्री नवीन मिश्र जी









`दीवार`

जुड़ती हूँ ईँट ईँट
तब जोड़ पाती हूँ
तुम्हेँ और
तुम्हारे नाते कुनबे

क्योँ मेरा जोड़ना
नहीँ भाता तुम्हेँ
खीँच देते होँ मुझे
दिलोँ के बीच.

मैँ चारो ओर से
घेर कर देती हूँ
आश्रय.
होकर खड़ी
अहर्निश तुम्हारी
रक्षा मेँ..

तपती दुपहरी
कँपकपाती ठंढ
कड़कती बिजली
बारिश भी सहती हूँ
बचाती रहती हूँ
तुम्हे, बनकर कवच.

तुम टूट टूट
खड़ा करते मुझे
अपनो के बीच

झेलती हूँ दोनो ओर के
पल पल
उफनते कलुष
और बिखरे दर्प,
को

विभाजित दिलोँ के
दरमियाँ
नहीँ रह पाती
मै खुश.

हटा दो मुझे बीच से
तोड़ दो मुझे.

मेरे भी कान होते हैँ
सुना होगा..
तुम्हारे एक होने पर
मै खुशी से
बोलने भी लगूँ गी.
सच...

-नवीन मिश्र

१९ अक्टूबर  २०१२ 


No comments:

Post a Comment