Wednesday, 11 January 2012

जो शेष है ... (सुप्रभात ) .. अपर्णा मनोज


जो शेष है ... (सुप्रभात )
by Aparna Manoj on Thursday, 13 January 2011


अभी भी शेष है

बचा रखा है यहीं अपने आँगन में

एक कलरव झरने का

जिसकी बूंदों को

प्रभाती चिड़िया चोंच में भर

छोड़ आती है

सुनहरी रेत पर

और एक सहज हंसी गेहूं की

लहलहा उठती है चैत्र के अधरों पर

किन्हीं पगलाई जड़ों में

झींगुर दबे पाँव

तोड़ते हैं सन्नाटा

और चांदी लिखते हैं जुगनू

रात के पन्ने पर .

अभी भी शेष है

धरती की निस्संग आँखों में

सागर का नमक

जिनके स्फटिक गालों पर

फूट जाती है लहरों की हंसी

और पर्वत गोल आँखों से देखता है

सुखों के पाश -बंध..

हिंसा के जंगलों में

अभी भी कुलांच भरते हैं कस्तूरी हिरण

ये सब शेष है

तुम्हारी भीड़ में

प्रकारांतर से सुनती हूँ

श्रद्धा और मनु

बुन रहे हैं किसी निविड़ में संसार

सृष्टि के झंकृत क्षण

ईर्ष्या ,वैमनस्य से परे

चिंता की खोह के बाहर

सूरज पलने लगा है गोद में ..

जानती हूँ

सभी उत्कोचों के रहते भी

शेष रहता है

कोमल प्रेम

जितना पुरातन ,उतना नवीन .



अपर्णा -


Photo: Gill & Terry Bass

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