Friday, 6 April 2012

प्रकाश ! - (शेखर)


17 March,2011


प्रकाश !


पराजय स्वीकार नहीँ करता मेरा मन.

मरुथल की मरीचिकाओँ सा मेरा दंभ.

कितना क्षीण पुरातन इसका जर्जर स्तम्भ.

फिर भी लहराये कीर्ति का परचम !


गिरा, विदीर्ण हुआ अनेक अवसरोँ पर, उठा भी

अनजाने घातोँ से बचता,

करता नित नूतन प्रयास.

पराजय के द्वार तक पहुँचा फिर भी

हूँ साधे जय का विश्वास.


ना कोई भरम अब,

पा लिया है मैने 'आशा का प्रकाश' ..


- शेखर

3 comments:

  1. यशवन्त जी,
    आपका सह्रदय धन्यवाद ..

    ReplyDelete
  2. सुमन कपूर 'मीत'

    Thank you very much Suamn ji.

    Regards.

    ReplyDelete