Monday, 30 April 2012

रविवार



एक कप चाय और मिलेगी क्या?

एक कप चाय और मिलेगी क्या?
सुनते ही तुम्हारा वो बरामदे से
कपड़े धोते हुए झाग भरे हाथ लिये
खीजकर कहना-
सुबह से कितनी बार दे चुके, अभी कितने कप और पियोगे?
देखो धुले कपड़ोँ का टब भर चुका
जरा छत पर फैला देते तो कुछ और धुल डालती
टंकी का पानी भी खत्म होने को है और नहाना भी बाकी है अभी ..
मगर तुम्हेँ इससे क्या, तुम्हारा तो इतवार है, पूरे दिन चलेगा ..
अरे कभी तो सुध ले लिया करो घर की
देखो बैठक मेँ जाले साफ किये कितने दिन हुए ..
अधमने से कुछ कपड़े फैलाकर
जाले बैठक के उतार जब भी लौटा,
तो चाय की प्याली को इंतज़ार करते पाया तिपाई पर अखबारोँ और पाँकेट डाइरियोँ के बीच .. वाह !
इस बीच बच्चोँ की धमाल, उनका नाश्ता, तेज़ कम होते टीवी की आवाज़,
कभी कुछ मित्र, पड़ोसी
सभी कुछ तो हैडल करती रही अकेली,
साथ मेँ मुझको बखूबी..
दोपहर बाद की झपकी, जब भी खुली आंखेँ
पाया सूखे साफ कपड़ो को तह करते
जैसे एक जीवन सहेज लिया फिर आज तुमने ..
इतवार, अमुमन कुछ सैकड़ोँ जो हमने साथ गुजारे
इन बीस सालोँ मेँ,
याद हैँ सभी मुझे, जैसे आज के अखबार के पन्ने
मुख्य पृष्ठ से लेकर वो चौबीस,
चार साप्ताहिकी और आठ वर्गीकृत विज्ञापनो वाले
कुछ श्वेत श्याम और रंगीन भी..
फिर इंतज़ार है रविवार के अगले संस्करण का,
और साथ मेँ एक कप चाय !!




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