Friday, 18 November 2011
'कुम्हार' का चाक' by Chandrasekhar Nair on Sunday, 13 November 2011 at 07:57
कुम्हार का चाक
बचपन मेँ
विस्मित एक टक
देखता था
कुम्हार के चाक को
एक इशारा, और
तेजी से घूमते चक्र को,
चाक धुन मे निमग्न
कुम्हार के वो
दक्ष हाथ
गढ़ देते
खूबसूरत पात्र
फिर भर देते
सतरंगी गुण ..
वो चक्र घूमता है
आज भी
पर बिना किसी
जोर के
उसकी चाक धुन अब
ध्वनि भी नहीँ करती ..
फिर भी
अगर न घूमता ये चाक
तो ये पात्र -
सुपात्र या कुपात्र,
क्या गढ़े जाते ?
आज भी विस्मय मे
सोचता हूँ
कि ये कालचक्र
न घूमता तो
कहाँ होते हम ?
न होती कोई भूमिका
न कोई पात्र
न रंग
और न जाने क्या करता
वो 'कुम्हार' ..
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चंद्रशेखरजी, ब्लॉग जगत में आपका स्वागत है, एक एक शब्द मानो एक नयी व्याख्या गढ़ रहा है....सुंदर और दर्शन से जन्मी अभूतपूर्व रचना के लिए बधाई........
ReplyDeleteउत्कृष्ट रचना से अभिभूत करने हेतु आभार !!
ReplyDeleteअंजू बहन, मन की बातें हैं, बहती रहीं, आपने पढ़ पसंद किया, बहुत आभार ..
ReplyDeleteआशीष भाई बहुत धन्यवाद, ब्लॉग कर आकर आपने अपने शब्दों से मान बढ़ाया ..
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