Friday, 9 December 2011
सत्य शिव और सुन्दर!
सत्य शिव और सुन्दर! by Anupama Pathak on Friday, 9 December 2011 at 13:31
एक कविता... कुछ एक बातों से प्रेरित जो चंद्रशेखर जी के मुखारविंद से निकले...! मन, मस्तिष्क और नाम को बुनते हुए कुछ यूँ बहे शब्द...
चंद्रशेखर...
यह तो शिव का ही एक नाम है न...
सत्य और सुन्दर!
आभासी तो
यह सारी दुनिया है...
कितने मोती है छिपाए हुए समंदर!
एक समंदर है
हर इंसान के अंतस्तल में
उबड़ खाबड़ भूमि है
तो नरमी भी है यहाँ वहाँ समतल में
बस किनारे से चलते हुए
भीतर तक जाना है
वहीँ जहाँ गहराई है
सत्य और शिव का ठिकाना है
हम स्वयं खुद से
दूर रहते हैं आजीवन
आत्मा से पहचान का
नहीं आता कोई मौसम
भीड़ में रहकर
भीड़ के हो जाते हैं
हम चले थे पाने खुद को
पर भंवर में खो जाते हैं
जितना चलते हैं धरती पर
सूक्ष्म क़दमों से उतना भीतर चलना है
आत्मा के द्वार पर दस्तक दे पायें
तब तक गिरना और संभलना है
यही हमारी आपकी सबकी
पहचान है
ईश्वर क्या है? हममें आपमें हम सब में
बसा हुआ भगवान है
जिस दिन शरीर में रहकर शरीर से परे
आत्मा स्वयं को मानेंगे हम
उस दिन मुस्कुराएंगे दिनमान
भाग जाएगा हृदय का तम
आभासी दुनिया में रहकर
हो जाए
यह एहसास प्रखर!
जीव ही शिव है
जीवन ही पूजा है
परिक्रमारत प्रतीत होती फिर हर डगर!
जिसकी जैसी दृष्टि होगी
वह वैसी दुनिया पायेगा
आभासी है यह जग
जो जैसा सोचेगा वह वैसा हो जाएगा
अपनी दुनिया... अपनी धरती पर
अपने अपने स्वर्ग और नर्क रचते हैं हम
हृदय कुञ्ज में कोलाहल है
और मन में बसते हैं कितने ही तम
माटी की काया में
जबतक है जगमग प्राण
मन मस्तिष्क में
है चलना यही विधान
तर्क बुद्धि मस्तिष्क की
और मन की चंचलता
सबसे श्रेष्ठ... सबसे परे
है हृदय की सरलता
बस यह प्रतिमान साथ हो
फिर सत्य सारे मूर्त हैं
जुड़ाव की प्रक्रिया की
पहली यह शर्त है
मन बुद्धि प्राण से बना यह शरीर
जिस दिन आत्मा को पहचानेगा
उस दिन वह
जीवन की महिमा को जानेगा
और हो जाएगा
सत्य , शिव और सुन्दर
खोज जिसे रहे हैं बाहर
विधाता ने रख छोड़े हैं वो सारे तत्व हमारे ही अन्दर!
स्वनामधन्य
शाश्वत की राह में
निरंतर अग्रसर!
चंद्रशेखर...
यह तो शिव का ही एक नाम है न...
सत्य और सुन्दर!
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'मन की बातें' पर मन की बातों को देखना सुखद है!!!
ReplyDeleteभाव सम्बद्ध होते हैं किसी एक बात से जो प्रेरणा बन कर लेखनी को दिशानिर्देश देती है... लेकिन एक बार कविता के धरातल पर आ गए... धारा बह निकली तो वह किसी एक से सम्बद्ध न हो कर हमारी , आपकी हम सबकी हो जाती है... इसे पढ़ कर भी ऐसा ही लगा हमें..! आपकी प्रेरणा न होती तो यह कविता भी न होती...
इसे यहाँ स्थान देने के लिए आभार!!!
प्रथम करें अभिवादन स्वीकृत, बात आपकी सच शत-प्रतिशत।
ReplyDeleteकभी आइये ब्लॉग पे मेरे, प्रगट कीजिये अपने अभिमत।
मेरी रचनायें करती हैं, आप सभी का दिल से स्वागत।
पक्ष में या प्रतिपक्ष में लिक्खें, सहमत हों या चाह असहमत।
मेरा लिखना तभी सार्थक, आपकी सोच हूँ जब अवगत।
Anupama ji
ReplyDelete"सत्य , शिव और सुन्दर
खोज जिसे रहे हैं बाहर
विधाता ने रख छोड़े हैं वो सारे तत्व हमारे ही अन्दर!"
इस तत्त्व को ढूंढना के लिए ही इस बहुमूल्य जीवन का उपहार इश्वर ने दिया है हम सब को .. कौन कितनी शिद्दत से ढूंढ कर पा ले, यह उसपर निर्भर है.. हम तो इस यात्रा का आनंद ले रहें हैं अबतक ..
उसे पा लेने की चाह से ज्यादे, आनंद उसे खोजने में मिलता है हमें ..
Anupama this is your own space, so no Abhaar,now onwards..
ReplyDeleteok:)
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