Friday, 6 January 2012

एक नया जन्म और चाहिए!




जो किताबो मेँ पढ़ा
वह रह गया पीछे
समय ने जो गढ़ा
जिन्दगी चली है वैसे
सूने प्रहरोँ मेँ
रहा अक्सर खो जाने
का भ्रम
बिखर गए सपनोँ का
ये कैसा अपनापन
समय के दशन से छला
जीवन नमन मेँ रहा सदा
संदर्भोँ के दर्प से टूटता रहा !

अब अनगिन प्रश्नोँ
का हल चाहिए
एक नया जन्म और चाहिए ..

सोच मेँ नम्रता
कार्य मेँ विशुद्धता
निर्णयोँ मेँ दृढ़ता
आचरण मेँ परमार्थता
क्यूँ न आई जीवन मेँ
सरलता सौम्यता,
भाग्य को निहारते
प्रतीक्षारत क्यूँ रहे?
अंधकार का हो शमन !

नव प्रभा मेँ
ईष्ट की ज्योति चाहिए
एक नया जन्म और चाहिए ..






Photo: By Kimmo Eväluoto@Picasa web albums

21 comments:

  1. समय ने जो गढ़ा
    जिन्दगी चली है वैसे

    True!!!
    Glad to read this:)

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  2. Anu,
    Thank you very much for reading and valuable comment!

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  3. बहुत खूब सर!

    सादर

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  4. यशवन्त जी
    आपके शब्दोँ का सह्रदय आभार !

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  5. सोच मेँ नम्रता
    कार्य मेँ विशुद्धता
    निर्णयोँ मेँ दृढ़ता
    आचरण मेँ परमार्थता
    क्यूँ न आई जीवन मेँ
    सरलता सौम्यता,
    भाग्य को निहारते
    प्रतीक्षारत क्यूँ रहे?

    aur zaroorat bhi kyun ho...

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  6. वाह ...बेहतरीन भाव संयोजन ।

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  7. बहुत सुंदर मन के भाव ...
    प्रभावित करती रचना ...

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  8. बेहतरीन प्रस्तुति...

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  9. ***Punam***जी,
    आपका बहुत आभार ..

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  10. वाह भाई जी कभी कभी आप चोंका देते हो ...जीवन की गाथा का आशय और नवसर्जन में जो खाई बनी है ..उसकी पीड़ा जबरदस्त उकेरी है ..बधाई भाई जी !!!!!!!!

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  11. S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib')जी,
    रचना पढने व पसंद करने के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद ..

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  12. संगीता स्वरुप ( गीत )जी,
    आपका बहुत धन्यवाद ..

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  13. सदा जी,
    आपके बहुमूल्य शब्दों का आभार ..

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  14. sushma 'आहुति'जी,
    आपका बहुत शुक्रिया ..

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  15. Kailash Sharma जी,
    आपके आभारी हैं ..

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  16. अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com)जी,
    रचना को आत्म-मंथन का नाम देने के लिए सदा आभारी रहेंगे ..

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  17. Travel Trade Service भाई सा,
    आपके शब्दों व प्रोत्साहन का सदैव इंतज़ार रहता है .. सादर वंदन !

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  18. यशवंत माथुर जी,
    आपका धन्यवाद इस साधारण रचना को 'नयी पुरानी हलचल' मेँ लिँक कर स्थान देने हेतु ..
    सादर ..

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