Monday, 9 January 2012
कन्यादान .. (अपर्णा दीदी)
अपर्णा दीदी की कलम से निकली यह रचना कुछ ऐसी छाप छोड़ गयी थी उस समय, जब पढ़ी थी, आज मन हो आया दोबारा पढने और संजोने का ..
कन्यादान
by Aparna Bhatnagar on Saturday, 17 July 2010 at 08:24
माँ -याद है कन्यादान !
शेष बचपन तुझे सौंप
मेरा चले जाना...
अल्पनाएँ
मेरे आंसू से नम
आज भी ज्यों की त्यों
तेरी देहर मढ़ी हैं ..
स्मृतियाँ तुलसी की
तेरे आँगन लगी हैं....
नहीं है तो
बस मेरा वहां होना ....!!
गठजोड़े की कच्ची नींव
सौंप तेरा विदा करना
माँ ,याद है मेरा यूँ चले जाना ......
फिर मेहनत और सब्र की दीवारें
एक-एक ईंट
घर का चिनना....
तूने भी तो यही किया था ...
तेरे अतीत से सीख आई थी
दीवारें पुख्ता करना .
अपनी सुर्ख मेहँदी
दीपदान में रखकर
रोज़ उसे लाल जलते देखना ...
कुछ सपने आलों में तह
करीने -से रख दिए हैं
यथावत ...!
खिड़कियों से आते प्रवाह
मौन संवादों की कड़ी ...
माँ ,मैंने इस प्रवाह में बहना सीख लिया है ...
तू भी तो बहती थी .....
छोटे-छोटे सुख -दुःख
उनकी अर्गला (चिटखनी )
बखूबी चढ़ाना ..
विश्वास की चूलों पर टिका दरवाज़ा
जानती हूँ बिना आहट के बंद करना
उनमें रहना , जीना
माँ , तू भी तो रहती थी यूँ सुरक्षित ....
घर के बाहर कुछ रंगोलियाँ पोर दीं हैं
स्वागत है ...
माँ , तेरी सीख के हर मेहमान का...
अभी जीना बाकी है ....
कन्यादान का यज्ञ
कुछ और होम करना है क्या ?
मैं तैयार हूँ .....
अपर्णा
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पढ़ते हुए ऑंखें नम हो गयी....सच कहूँ तो ये हर बेटी की नियति है, मन को दो हिस्सों में बांटना, एक को वहीँ छोड़ आती है जहाँ जन्मीं, खेली, पली, बढ़ी और दूसरे को साथ लेकर मन-मन भारी क़दमों से, चली आती है ससुराल, क्योंकि जिनकी और आशा से देखती है वही कन्यादान कर सौंप देते हैं एक अनजाने के हाथ.......
ReplyDeleteAnju Sharma ji,
ReplyDeleteThanks for being here and for your valuable comments!
Regards,