Tuesday, 10 January 2012
ब्रह्म मुहूर्त का प्रहर .. शोभा मिश्र दीदी
October 21, 2011
शोभा मिश्र दीदी कि एक सुन्दर रचना जो ले जाती है ग्रामीण परिवेश में ढलती एक सुहानी सुबह की ओर ..
ब्रह्म मुहूर्त का प्रहर
पास 'पोखर' से आती
'भुजैटें' की आवाज़
चौखट के अन्दर से आती
'पायल' की झुन झुन
भक्तिमय मन्त्रों के
उच्चारण की गुन-गुन
'कुचिया ' से बुहार की आवाज़
चूल्हे से आती लेप की सुगंध
हल्का उजाला क्षितिज पर
अम्बर के माथे नहीं सजा
अभी नूरानी सूरज
आँगन में एक सखी के
माथे पे चमकती "टिकुली "
मंद मंद मुस्काती
इक माँ अन्नपूर्णा
'अदहन' धरने लगी चूल्हे पर
संग संग उनकी मधुर आवाज़
मैं सुनती रही गुन-गुन
उफ्फ़ ! ये कैसी कर्कश
गाड़ियों के हार्न की आवाज़ ?
मैं घबरा के उठ बैठी , जिसे सुन
महानगरों के शोर में
गाँव के सुन्दर ख्वाब रही थी बुन ......
~ ~ शोभा ~ ~
'भुजैटें' = पंक्षी
'कूची '= झाड़ू
'टिकुली' = बिंदी
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बहुत सुन्दर...
ReplyDeleteThe contrast well underlined in the poem!
Thanks to Shobha didi ..
ReplyDeletebahut sundar rachna
ReplyDeleteThis comment has been removed by the author.
Deleteमीना दी आप पहली बार हमारे ब्लॉग पर आईं हैं, आपका धन्यवाद एवं हार्दिक स्वागत !
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