Tuesday, 9 April 2013

`गंगा` - श्री नवीन मिश्र जी








`गंगा`

हे!
पतित पावनी
मै जन्मा
तेरे किनारे
वत्सला!
खेल खेल कर
तेरी गोद मेँ
दिन गुजारे,
सपने सँवारे
पाप धोये
कितनी बार
पावन जल मेँ
पर आज मैँ
अपनी कमी को
खोजता हूँ
ये ऋण कैसे उतारूँ
सोचता हूँ
अपने सारे पुण्य
आज लो
तुम्हेँ सौँपता हूँ.


- नवीन मिश्र

(७ जुलाई २०१२) 

`दीवार` - श्री नवीन मिश्र जी









`दीवार`

जुड़ती हूँ ईँट ईँट
तब जोड़ पाती हूँ
तुम्हेँ और
तुम्हारे नाते कुनबे

क्योँ मेरा जोड़ना
नहीँ भाता तुम्हेँ
खीँच देते होँ मुझे
दिलोँ के बीच.

मैँ चारो ओर से
घेर कर देती हूँ
आश्रय.
होकर खड़ी
अहर्निश तुम्हारी
रक्षा मेँ..

तपती दुपहरी
कँपकपाती ठंढ
कड़कती बिजली
बारिश भी सहती हूँ
बचाती रहती हूँ
तुम्हे, बनकर कवच.

तुम टूट टूट
खड़ा करते मुझे
अपनो के बीच

झेलती हूँ दोनो ओर के
पल पल
उफनते कलुष
और बिखरे दर्प,
को

विभाजित दिलोँ के
दरमियाँ
नहीँ रह पाती
मै खुश.

हटा दो मुझे बीच से
तोड़ दो मुझे.

मेरे भी कान होते हैँ
सुना होगा..
तुम्हारे एक होने पर
मै खुशी से
बोलने भी लगूँ गी.
सच...

-नवीन मिश्र

१९ अक्टूबर  २०१२ 


Friday, 11 January 2013

'पुकार' by Aparna R Bhagwat

यह हमारी अपर्णा दीदी जी हैं, जिनको हम दीजी के नाम से संबोधित करते हैं .. 
चुप-चाप से अक्सर ऐसा लिख जाती हैं  कि, कुछ छाप,   ऐसी छाप जाती हैं कि,  उसे एक जीवन भर का स्मरण  दे जाती हैं मेरी दीजी .. अनंत शुभकामनायें ! यहाँ सुनिए मेरी दीजी को:


" महल में बनी बावड़ी के किनारे बैठी,
पानी पर जमी काई में गुजरी पुश्तों की तसवीरें देख रही थी,
नहीं, शायद समय की परछाईयों में तैरते हुए चेहरों में खुदको ढूँढ रही थी,
और प्रयासरत थी कुछ अनकहा सुनने में।" ..


" कुछ तो था उन दीवारों में जो गा उठीं मेरे एक स्पर्श से,

और खींच ले गयीं मुझे, अपने वैभव काल में,
पत्थरों पर तराशी हर वो कहानी, हर लता पर खिली कली, हर वो बारीक आकृति,
मानो जीवंत हो सुगन्धित हो गयीं मेरी उँगलियों तले। "




दरीचों में फडफडाते कबूतर पलट जाते थे पन्ने इतिहास के,
और अँधेरे छांटकर रोशन हो जाते कई झरोखे,
मद्धम पीली रौशनी में से झांकते थकी आँखों वाले चेहरे,
इस काल में अपना अस्तित्व खोजते हुए।






" खुले दालानों  में चलती साँय-साँय हवा गवाह थी,
देखे थे उसने कई सौ आनंद-नृत्य, कभी स्वागत तिलक तो कभी उठती अर्थियां,
अन्दर बाहर करते योद्धाओं की ललकार, कभी खून की बहती नदियाँ,
उसकी छाती पर रचे स्वाभिमान के जौहर और रूपसियों की निरीह नज़रों की गरमाहट सीली नही थी अभी। "




"मंदिरों के भग्न-अवशेषों में कदम रखते ही,
गूँज उठी घंटियों और रण चंडी को प्रसन्न करते मन्त्रों की आवाज़,
बस कमी थी तो दिए की लौ और धुप से उठते सुगन्धित सुवास की,
महल में वास था, बूँद-बूँद टपकते दूध से अभिषिक्त, बेलपत्री से ढंके सृष्टि के विनाशक महादेव का। "



यथाकाल प्रासाद के द्वारों के पीछे छूटी थीं कई मान्यताएं,
मुझ तक पहुंची थी एक मौन पुकार, एक अदृश्य बढ़ा हाथ,
 इस युग में खुदको स्थापित करने कुछ ढूंढता-सा,
बस, उस राजमंदिर की शान्ति और इस कोलाहल के बीच फैला था -
                                              ये अपारगम्य समय।


- अपर्णा


(Photographs courtesy: Ashutosh Rangnekar ) http://aparna-insearchofself.blogspot.in/2013/01/blog-post_7.html

Monday, 11 June 2012



शब्दोँ की अठखेलियां..

शब्दोँ की अठखेलियां अक्सर करती हैँ मुझसे 
बेबाक बतकही.
कभी मेरी चैतन्यता पर करती प्रहार
छीन कर मुझसे शब्द
चिढ़ाती हैँ मुझे
मेरी हर सोच की अस्मिता पर पूँछती सवाल.. 
हर चयन पर हुआ नादानियोँ का हिसाब.
खुली आंखोँ से सपने देखता रहता मैँ
पर शब्दोँ का खेल
सजग करता
मुझे.
रास्ते के हर मोड़ पर...
दे जाता एक
नया शब्द..
एक नई परिभाषा !






Monday, 30 April 2012

रविवार



एक कप चाय और मिलेगी क्या?

एक कप चाय और मिलेगी क्या?
सुनते ही तुम्हारा वो बरामदे से
कपड़े धोते हुए झाग भरे हाथ लिये
खीजकर कहना-
सुबह से कितनी बार दे चुके, अभी कितने कप और पियोगे?
देखो धुले कपड़ोँ का टब भर चुका
जरा छत पर फैला देते तो कुछ और धुल डालती
टंकी का पानी भी खत्म होने को है और नहाना भी बाकी है अभी ..
मगर तुम्हेँ इससे क्या, तुम्हारा तो इतवार है, पूरे दिन चलेगा ..
अरे कभी तो सुध ले लिया करो घर की
देखो बैठक मेँ जाले साफ किये कितने दिन हुए ..
अधमने से कुछ कपड़े फैलाकर
जाले बैठक के उतार जब भी लौटा,
तो चाय की प्याली को इंतज़ार करते पाया तिपाई पर अखबारोँ और पाँकेट डाइरियोँ के बीच .. वाह !
इस बीच बच्चोँ की धमाल, उनका नाश्ता, तेज़ कम होते टीवी की आवाज़,
कभी कुछ मित्र, पड़ोसी
सभी कुछ तो हैडल करती रही अकेली,
साथ मेँ मुझको बखूबी..
दोपहर बाद की झपकी, जब भी खुली आंखेँ
पाया सूखे साफ कपड़ो को तह करते
जैसे एक जीवन सहेज लिया फिर आज तुमने ..
इतवार, अमुमन कुछ सैकड़ोँ जो हमने साथ गुजारे
इन बीस सालोँ मेँ,
याद हैँ सभी मुझे, जैसे आज के अखबार के पन्ने
मुख्य पृष्ठ से लेकर वो चौबीस,
चार साप्ताहिकी और आठ वर्गीकृत विज्ञापनो वाले
कुछ श्वेत श्याम और रंगीन भी..
फिर इंतज़ार है रविवार के अगले संस्करण का,
और साथ मेँ एक कप चाय !!




Friday, 6 April 2012

प्रकाश ! - (शेखर)


17 March,2011


प्रकाश !


पराजय स्वीकार नहीँ करता मेरा मन.

मरुथल की मरीचिकाओँ सा मेरा दंभ.

कितना क्षीण पुरातन इसका जर्जर स्तम्भ.

फिर भी लहराये कीर्ति का परचम !


गिरा, विदीर्ण हुआ अनेक अवसरोँ पर, उठा भी

अनजाने घातोँ से बचता,

करता नित नूतन प्रयास.

पराजय के द्वार तक पहुँचा फिर भी

हूँ साधे जय का विश्वास.


ना कोई भरम अब,

पा लिया है मैने 'आशा का प्रकाश' ..


- शेखर

'केन्द्र का बिन्दु' - (शेखर)


27 February 2011


मन से हूँक उठी एक रचना पढ़कर..

जिस किसी को केन्द्र मेँ रखकर लिखी जाती हैँ,

क्या उसका पक्ष सामने आ पाता है कभी?

उत्सुकता पीर को क्या प्रोत्साहित नहीँ करती?

तथाकथित से भी कभी

पूछ ले कोई,

कि भाई तुम्हारा प्वॉइन्ट ऑफ व्यू क्या है,

कुछ तुम्हेँ भी कहना है?

थोड़ी छूट दी जाती है तुम्हेँ,

कहो- क्या कारगुजारियां रहीँ तुम्हारी?

जो लेखनी को रचनी पड़ी पंक्तियां करुणामयी ..!



प्रतीक्षा मेँ है खड़ा केन्द्र का बिन्दु पात्र,

कि ईश्वर कभी अवसर दे,

कोई पूछे और समझे,

कि आखिर मामला क्या है?

यह क्योँ यहाँ विक्षिप्त सा पड़ा है?

कोई बता पाये तो भला, वरना-

समय ढक लेगा तुम्हेँ अपने आवरण मेँ,

रचना तो ऐतिहासिक हो जायेगी

वाह-वाह की मोटी परत तुम्हारी काया पे जम जायेगी..

न कोई पूछेगा न दोहराये जाओगे

भाग्य से यही पारितोषक पा जाओगे..

रचना के स्तम्भ के नीचे

फूलोँ की महक के साथ

दफनाये जाओगे !


- शेखर