Friday, 9 December 2011

प्रेम अक्षुण्ण रहे! प्रस्तुतकर्ता अनुपमा पाठक at ३१ अगस्त २०११







प्रेम अक्षुण्ण रहे! अनुपमा पाठक
shared on facebook by Chandrasekhar 7 Dec.2011 Wednesday at 21:53


एक पावन
एहसास से
बंध कर
जी लेते हैं!
मिले
जो भी गम
सहर्ष
पी लेते हैं!
क्यूंकि-
प्रेम
देता है
वो शक्ति
जो-
पर्वत सी
पीर को..
रजकण
बता देती है!
जीवन की
दुर्गम राहों को..
सुगम
बना देती है!

बस यह प्रेम
अक्षुण्ण रहे
प्रार्थना में
कह लेते हैं!
भावनाओं के
गगन पर
बादलों संग
बह लेते हैं!
क्यूंकि-
प्रेम देता है
वो निश्छल ऊँचाई
जो-
विस्तार को
अपने आँचल का..
श्रृंगार
बता देती है!
जिस गुलशन में
ठहर जाये
सुख का संसार
बसा देती है!






You, Sunita Arun, Ashish Pandey and 2 others like this.

Ashish Pandey: वैसे भाई जी थोड़ी सी असहमति ,भाव अक्षुण्ण ही रहता है ,बदलते तो हम और आप हैं ...:)
Wednesday at 22:10 · Unlike · 1

Chandrasekhar Nair: भाई जी समय काल ..! अब अक्षुण्ण कौन ..
Wednesday at 23:59 · Like

Anupama Pathak: सारे सांसारिक बंधन और प्रेम स्वार्थ पर आधारित हैं... यह बात सुनने में कटु अवश्य है पर है सत्य और वो भी अकाट्य! प्रेम न बदलता हो पर हम तो बदलते हैं न और ये हमीं हैं जो प्रेम करते हैं तो जब हम अक्षुण्ण नहीं तो हमारा प्रेम कैसे हो अक्षुण्ण... सभी बातें सापेक्षिक हैं! अक्षुण्ण है तो मात्र प्रभु का प्रेम अपने भक्तों के प्रति... भक्त भी कहाँ कर पाते है 'उससे' उस जैसा अलौकिक प्रेम! ऐसे में यह कामना ही की जा सकती है कि 'प्रेम अक्षुण्ण रहे'!
Yesterday at 13:47 · Unlike · 2

Nirmal Paneri: बस यह प्रेम
अक्षुण्ण रहे
प्रार्थना में
कह लेते हैं!
भावनाओं के
गगन पर ....वाह बात ये है की ...इंसानी जीवन में ...भावनाओं का सम्मान और उसका ही सार्थक जीवन को उर्जा देने का जो अणु कहा दो ...बड़ी बात नहीं वही सबसे सहक्ति सहली हुआ करता है ....बाकि बड़ी बात में करना जनता है नहीं ....उसके जीती भी इन्सान भवना रखता हो तो शायद ही जीवन में ठोकरें खये ...पर उसकी फितरत की ...भावना को प्रधान न मान कर बाकि बैटन को सर्वोपरी रखा करता है ...और जीवन भर बस उन चीजों में भटकता रहता है जो उसको खुद को मालूम नहीं ...क्यू की भावना हे ही नहीं उस के लिए ...बाकि जीवन की शुरुवात और अंत वही बीच में भावनाओ का स्थान ...अअब कुछ उसको बोझ समझे तो ये इंसानी सोच ...वो परम पिता उसके पास सब कुछ ...बस भावना का भूखा है ....एक मुट्ठी में संसार लुटा दिया ...बड़ी बातें हम इन्सान के पास ..बिना भावना के ...जबरदस्त आलेख अणु जी का ...मेरे पास कुछ भी शब्द नहीं ..अज्ञानी इस रिदयंगम स्तुति के सामने पर मुझे सुबह से समय नहीं मिला में आ नहीं सका ..जबकि मेरी भावना सुबह से इस पर थी ...और इस संसार रूपी माया में जिसको जो पसंद वही वस्तु पाने की चेष्टा भी ...मुझे न पद का ज्ञान न शब्दों का ..पर भावना मेरे लिए सर्वोपरी ...और मुझे ये पक्तियां खुद को जीने की प्रेरणा दे गयी !!!!!!बहुत शुक्रिया भाई जी ...और दिल से बधाई अनु जी को !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!111
17 hours ago · Unlike · 1

Anupama Pathak: ‎Nirmal ji, कमेंट्स के रूप में आपके लिखे गद्य हमेशा सारपूर्ण होते हैं... हमें तो लगता है कि यहाँ वहां फेसबुक की कई दीवारों पर कितनी ही पोस्ट्स पर व्याप्त आपकी लिखी बातों को संगृहीत कर लेना चाहिए...!
आपका आशीर्वाद सदा कविताओं को प्राप्त होता रहता है इसके लिए आभार व्यक्त करना शब्दों से परे है...! One day I have planned to surprise you with all your invaluable comments compiled:) oh! I just revealed it...:) ab surprise kahaan rahega...
17 hours ago · Unlike · 2

Chandrasekhar Nair: इतनी बड़ी कायनात उसकी, उसमेँ ये छः फिट के आसपास का ढांचा .. फिर उसके भीतर पहले रखा पखुड़ियोँ सा कोमल सुजाग्रत ह्रदय .. फिर बाकि सब, और फिर आखिरी मेँ ये मस्तिष्क ..होड़ लगाता है शुरु से आखिर तक, झुठलाने उस वात्सल्य करुणा को बेमतलब समझ .. ये उसका काम है, करता रहे ..
17 hours ago · Like · 2

Chandrasekhar Nair: निर्मल भाई .. आपका भी सात सौ पचास-एक ग्राम का मैटर ग्रे नहीँ हुआ अभी तक .. ग्रीन है और प्रण है ग्रीने बनाय रक्खब ..
हाहाहा .. :))
16 hours ago · Like · 2

Nirmal Paneri: ‎@anu ji मैनें न आप ओ देखा न आप से कभी बात की ...बस जब २-ढाई साल पहले आप की रिदयंगम स्तुतियों से वास्ता पड़ा ...में इस बात से गर्वित हुआ की ...इस तरह के संस्कार !!!!मेरा नमन उन माता पिता को बस इसके आगे ...मेरे शब्द एक ढकोसला लग सकतें है आज की छद्म दुनिया को ..मुझे कुछ भी नहीं कहना कुछ ही लोग हुआ करतें है जो जीवन में प्रेरणा दे जातें है ..बाकि ..मेरे आगे सब कुछ बेकार ही ..मुझे पता है संस्कारों का पानी कितने पटल तोड़ कुओं निकल कर एक माता पिता लातें है ...हम पी न सके ...!!!खेर लम्बी बात पर...यहाँ इतना मान मिल जाये तो जीवन धन्य है !!!!!शुक्रिया भाई जी का !!!!!!!!!!!
16 hours ago · Unlike · 1

Chandrasekhar Nair: अरे ऊपर का पढ़िये तो भाइसा ..
16 hours ago · Like

Anupama Pathak: You live up to your name Nirmal ji...
16 hours ago · Unlike · 2

Chandrasekhar Nair: ‎& where do i, Anu.. :)
16 hours ago · Like

Anupama Pathak: grey matter, CNS aur heart ke baare mein yun padh kar accha laga!Well put Chandrasekhar ji:)
16 hours ago · Unlike · 1

Anupama Pathak: ‎Chandrasekhar bhaiya, You are epitome of values... aur kya bolun! Great to have known you:)
16 hours ago · Like · 1

Anupama Pathak: ‎Ashish ji, aapke shabdasheesh pa kar kavita dhany hui! Thanks for the divine favour!
16 hours ago · Like

Chandrasekhar Nair: Anu, since i do not have those dark colours inside, i prefer them as outfits, hence i wrote like that.. thanks.. anyway i'v bn told & coached about this virtual world.. not my cuppa .. let's see .. tc .. gn .. :)
16 hours ago · Like

Chandrasekhar Nair: epitome ढह जाने के लिए होते हैँ ..
16 hours ago · Like · 1

Anupama Pathak: ‎'& where do i, Anu.. :)' followed by other comments of yours has directed me towards a poem... likh paaye to padhayenge:)
tc .. good night!
16 hours ago · Unlike · 1

Chandrasekhar Nair: jio mere laal .. tc.. cu frsh .. thanks .. gn .. :))


Anupama Pathak:
अभी अभी इस पूरी पोस्ट को 'मन की बातें' पर देख कर आ रहे हैं...!!!
It was such a pleasant surprise:) Accept my deep sense of gratitude for the effort you took to preserve the moments of bliss that gave way to the poem...
कविता की पृष्ठभूमि तैयार कैसे हुई... इसका लेखा जोखा... आशीष जी की बात से बात निकली और मन की बातों ने कैसे कैसे तार जोड़ निकाले!
'प्रेम अक्षुण्ण रहे' को साझा किया आपने, एक बड़ी ही सुन्दर बात कही आशीष जी ने... फिर निर्मल जी के निर्मल वचन और आपकी मन मस्तिष्क को लेकर सुन्दर विवेचना...
सबने मिलकर 'सत्य शिव और सुन्दर' रचा... यह 'Ashish' ,'Chandrasekhar' , 'Nirmal' और 'Anupama' के साझे प्रयास का फल है!
Thanks everyone for the divine favour!!!
Saturday at 12:20 · Unlike · 1
16 hours ago · Like

Chandrasekhar Nair: छोटी बहन अनु के लिये अभी बाकि है हमारे (शेखर) अंतःमन की बात .. :)
Saturday at 12:24 · Like


सत्य शिव और सुन्दर! by Anupama Pathak on Friday, 9 December 2011 at 13:31



एक कविता... कुछ एक बातों से प्रेरित जो चंद्रशेखर जी के मुखारविंद से निकले...! मन, मस्तिष्क और नाम को बुनते हुए कुछ यूँ बहे शब्द...


चंद्रशेखर...

यह तो शिव का ही एक नाम है न...

सत्य और सुन्दर!



आभासी तो

यह सारी दुनिया है...

कितने मोती है छिपाए हुए समंदर!



एक समंदर है

हर इंसान के अंतस्तल में

उबड़ खाबड़ भूमि है

तो नरमी भी है यहाँ वहाँ समतल में

बस किनारे से चलते हुए

भीतर तक जाना है

वहीँ जहाँ गहराई है

सत्य और शिव का ठिकाना है

हम स्वयं खुद से

दूर रहते हैं आजीवन

आत्मा से पहचान का

नहीं आता कोई मौसम

भीड़ में रहकर

भीड़ के हो जाते हैं

हम चले थे पाने खुद को

पर भंवर में खो जाते हैं

जितना चलते हैं धरती पर

सूक्ष्म क़दमों से उतना भीतर चलना है

आत्मा के द्वार पर दस्तक दे पायें

तब तक गिरना और संभलना है

यही हमारी आपकी सबकी

पहचान है

ईश्वर क्या है? हममें आपमें हम सब में

बसा हुआ भगवान है

जिस दिन शरीर में रहकर शरीर से परे

आत्मा स्वयं को मानेंगे हम

उस दिन मुस्कुराएंगे दिनमान

भाग जाएगा हृदय का तम



आभासी दुनिया में रहकर

हो जाए

यह एहसास प्रखर!



जीव ही शिव है

जीवन ही पूजा है

परिक्रमारत प्रतीत होती फिर हर डगर!



जिसकी जैसी दृष्टि होगी

वह वैसी दुनिया पायेगा

आभासी है यह जग

जो जैसा सोचेगा वह वैसा हो जाएगा

अपनी दुनिया... अपनी धरती पर

अपने अपने स्वर्ग और नर्क रचते हैं हम

हृदय कुञ्ज में कोलाहल है

और मन में बसते हैं कितने ही तम

माटी की काया में

जबतक है जगमग प्राण

मन मस्तिष्क में

है चलना यही विधान

तर्क बुद्धि मस्तिष्क की

और मन की चंचलता

सबसे श्रेष्ठ... सबसे परे

है हृदय की सरलता

बस यह प्रतिमान साथ हो

फिर सत्य सारे मूर्त हैं

जुड़ाव की प्रक्रिया की

पहली यह शर्त है

मन बुद्धि प्राण से बना यह शरीर

जिस दिन आत्मा को पहचानेगा

उस दिन वह

जीवन की महिमा को जानेगा

और हो जाएगा

सत्य , शिव और सुन्दर

खोज जिसे रहे हैं बाहर

विधाता ने रख छोड़े हैं वो सारे तत्व हमारे ही अन्दर!



स्वनामधन्य

शाश्वत की राह में

निरंतर अग्रसर!



चंद्रशेखर...

यह तो शिव का ही एक नाम है न...

सत्य और सुन्दर!




Anupama Pathak: ‎'मन की बातें' पर मन की बातों को देखना सुखद है!!!
भाव सम्बद्ध होते हैं किसी एक बात से जो प्रेरणा बन कर लेखनी को दिशानिर्देश देती है... लेकिन एक बार कविता के धरातल पर आ गए... धारा बह निकली तो वह किसी एक से सम्बद्ध न हो कर हमारी , आपकी हम सबकी हो जाती है... इसे पढ़ कर भी ऐसा ही लगा हमें..! आपकी प्रेरणा न होती तो यह कविता भी न होती...
इसे यहाँ स्थान देने के लिए आभार!!!

s.chandrasekhar.india said... Anupama ji
"सत्य , शिव और सुन्दर
खोज जिसे रहे हैं बाहर
विधाता ने रख छोड़े हैं वो सारे तत्व हमारे ही अन्दर!"
इस तत्त्व को ढूंढना के लिए ही इस बहुमूल्य जीवन का उपहार इश्वर ने दिया है हम सब को .. कौन कितनी शिद्दत से ढूंढ कर पा ले, यह उसपर निर्भर है.. हम तो इस यात्रा का आनंद ले रहें हैं अबतक ..
उसे पा लेने की चाह से ज्यादे, आनंद उसे खोजने में मिलता है हमें ..

1 comment:

  1. WOW!!!
    This is just wonderful...
    कविता की पृष्ठभूमि तैयार कैसे हुई... इसका लेखा जोखा... आशीष जी की बात से बात निकली और मन की बातों ने कैसे कैसे तार जोड़ निकाले!
    'प्रेम अक्षुण्ण रहे' को साझा किया आपने, एक बड़ी ही सुन्दर बात कही आशीष जी ने... फिर निर्मल जी के निर्मल वचन और आपकी मन मस्तिष्क को लेकर सुन्दर विवेचना...
    सबने मिलकर 'सत्य शिव और सुन्दर' रचा... यह आशीष, चंद्रशेखर, निर्मल और अनुपमा के साझे प्रयास का फल है!

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