Saturday, 3 December 2011

यात्रा १




यात्रा १


यूं तो बड़े लोगों के
यात्रायों के संस्मरण पढ़े
थे हमने

कुछ मन किया के
आज कोशिश कर जी लें
फिर अपने जीवन की
पहली यात्रा के वो क्षण
शहर लखनऊ से त्रिवेंद्रम

रिक्शे पे
लादे होल्डाल और
दो अटैची
आगे थे पिता,
पीछे वाले पर
एक अदद सुराही,
डोलची में मिठाई
के डिब्बों में सफ़र
का खाना
और कस के पकडे
माँ का पल्लू
यकीन -
गिरने नहीं देगा
रिक्शे से नीचे
एक छह साल का
यात्री

स्टेशन की भीड़
कोयले का इंजन
उसकी लम्बी सीटी
धडधड करते लोहे के पहिये
चलने से पहले ही
पहुंचा देंगे जैसे,
वो रफ़्तार
अब भी करती
है रोमांचित
स्टेशनों पर चाय चाय
की आवाजें के बीच
पानी की प्यास
बिस्कुट संतरे
और केलों के साथ
कानपुर आया
खिड़की की जिद
झाँसी पर काला चेहरा
साफ़ करती माँ
के हाथ
कि खुली नींद
रात रिटायरिंग रूम
की रौशनी में ..




क्रमश:

2 comments:

  1. इस श्रृंखला की अगली कड़ी कब आएगी...?
    धडधड करते लोहे के पहिये
    चलने से पहले ही
    पहुंचा देंगे जैसे,
    beautiful!

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  2. अनुपमा जी,
    १९७१ की यादें है, दूसरा पार्ट याद में तो है, शब्दों में ढालना बाकी है. प्रयत्न कर जल्दी लिख कर पेश करेंगे.. आभारी हैं आपके, कोई कविता नहीं है यह, फिर भी आपने पढ़ा इसे ..

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