Monday, 5 December 2011

'पथप्रदर्शक माँ - अनुपमा की कलम से' चित्र के भाव को उकेरने का हमारा साझा प्रयास ..






सीखते हैं जीवनपर्यंत हम

हर ठोकर के बाद

आती है... रह जाती है

मन में बस कर कोई याद



गुरु रूप में कभी कोई

तो कभी कोई

करता रहता है मार्गदर्शन

मिलते रहते हैं

हर मोड़ पर कितने ही

जीवनदर्शन



कभी जीवन स्वयं

ऊँगली पकड़ कर चलना

सीखलाए

तो कभी किसी का उपदेश

पथप्रदर्शक बन जाए



हो जाते हैं हम

गिर कर खड़े

परिमार्जित कर भोलेपन को

हो जाते कुछ और बड़े



बस ज़रा सी

आँखें नम करनी हैं

और श्रद्धानत होना है उसके समक्ष

जो अपनी धरणी है



उड़ना जिसने सिखलाया

पंछी को वह ममता याद रही

चाहे वो उड़कर जाए कहीं

उसके भीतर ममत्व आबाद रहे



सीखों को समझना

जिसने सिखलाया

अन्धकार में हमसे -

वो पहला दीप जलवाया



जो जीवन तो देती ही है

उसका ध्येय भी समझाती है

त्याग सभी सुखों को

वह स्वांस हमारी बन जाती है



इश्वर से भिन्न नहीं उसका अस्थान

हे माँ ! तुम्हें बारंबार प्रणाम ..




Picture by: Wisdom of the Sacred Feminine

4 comments:

  1. अन्धकार में हमसे -

    वो पहला दीप जलवाया.........वाह भाई जी ...कितने सरल मनोभाव से अभिव्यक्ति !!!!!!!बहुत प्यारी है !!!!!!!!!!!!11

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  2. Re posting has made the scribbled words look beautiful... all credits to you!!! Its more of yours than mine... you inspired and waited for something to be written... and so it surfaced, thus it can be aptly titled something as "पथप्रदर्शक माँ"... चित्र के भाव को उकेरने का हमारा साझा प्रयास... हमारी कलम से!" instead of "पथप्रदर्शक माँ"... अनुपमा की कलम से!":)

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  3. निर्मल भाई, सच्चे सरल शब्द सीधे मन को छू जाते हैं, सही फरमाया आपने ..
    बहुत शुक्रिया आपका भाई ..

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  4. Anupama ji, I feel now, your suggestion is appropriately done with, but words remain yours..!
    Thanks once again for the favour..

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