Friday, 16 December 2011
स्वप्न और विश्वास ..
आज 'मेरे सपने' पढ़ी अनुपमा जी की, रचना एक वर्ष पूर्व की है, पर लगा जैसे हमारे भावों को नवीन शब्द मिल गए, अपने आप को रोक नहीं पाए, इसे यहाँ शेयर करने से .. दिसम्बर २१, २०११
http://www.anusheel.in/2010/12/blog-post_15.html?showComment=1324485290748#c3974357551902609830
प्रस्तुतकर्ता अनुपमा पाठक at १५ दिसम्बर २०१०
मेरे सपने!
अथाह सागर को
एक नन्ही सी
नाव के सहारे
नाप आये...
मेरे सपने!
विस्तार कितना है
जीवन का
सब सत्य
भांप आये...
मेरे सपने!
विशाल अम्बर पर
विचरण कर
वहाँ अपनी शब्दावली
छाप आये...
मेरे सपने!
सारी घृणा
सकल कृत्रिमता को
इकठ्ठा कर
ताप आये...
मेरे सपने!
आशान्वित हो
दुर्गम राहों को
बड़ी सुगमता से
नाप आये...
मेरे सपने!
Anju Sharma
दिसम्बर १६, २०११
एक उनींदी सुबह
जब समेटती है कई
अधूरे स्वप्नों को,
अधखुली आँखों से
विदा पाते हैं,
भोर के धुंधले तारे,
कुछ आशाओं को पोंछकर
चमकाते हुए,
अक्सर दिखती है,
खिड़की के बाहर,
फटी धुंध की चादर,
उससे तिरता
एक नन्हा मेघदूत,
जिसके परों पर चलके
आता है
चमकीली धूप का
एक नन्हा सा टुकड़ा
भर जाती है एक बक्से में
सारी सर्द ठिठुरती रातें,
रातें जो दबी हैं
स्वप्नों के बोझ तले,
जिनमे उलझते हुए,
वो भी देखा
जो अदृश्य है,
अगोचर है,
अनगिनित हाथ लम्बी
रश्मियों की बाहें,
जब घेरती हैं वजूद,
कालखंड के मध्य
झरता समय प्रवाह
स्टेचू बन करता है
फिर से
रात्रि के ओवर
कहने की प्रतीक्षा,
तब स्वप्न सो जाते हैं
एक मीठी लम्बी नींद,
मिटाने
अपनी दुर्गम यात्रा
की थकान.......
विश्वास ..
दिसम्बर १६, २०११
हमेँ जगाकर
झोँक देता है फिर
नई चुनौतियोँ
भरी एक यात्रा मेँ ..
जो कुछ पहेलियाँ
दे जाए समय
तुम्हारी मुट्ठी में
उन्हें फिर से
बोते जाओ,
कि
सुलझाने में वो
उलझनें ना
बन जाएँ कहीं ..
बहते जाओ
निर्झर
प्रपात बन -
बस
प्रश्न न करो,
रखो विश्वास
और
आशायेँ जीवित
कि
ये ही बना देंगे -
हमारी यात्रायेँ
सरल और सुगम ..
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ReplyDeleteAnupama:
ReplyDeleteThis is my pleasure & greatness of God almighty that we are are with you.
Blessings & Love ..
शेखर भैया ..