Thursday, 1 December 2011

पकी उम्र का बचपन




पकी उम्र का बचपन



एक पकी उम्र का आदमी
गुज़ारता है
सच में
एक छोटे बच्चे सी ज़िन्दगी

पा जाता है जब कुछ पहाड़ी फूल
ख़ुशी उसकी देखते है बनती
मुस्कुरा दे शहरों की रोशनियाँ देख
मज़ा दे जाती उसको बच्चों की शोखियाँ

मगर घबरा जाता है अकेले खड़े, पुल पर
पानी में देख अपनी ही छवि
उसके पस्त हाथों में एक किताब
याद दिला जाती अपने स्कूल का बरामदा

दीवार पर लगी घड़ी का अलार्म
याद दिलाये उसको .. अभी खानी है दवा !
रातों में उठ-उठ कर जागता भी है अक्सर
खिडकियों पे जाने क्या खोजता है

सुबह की किरणें क्या पता,
लौटा कर ला दें वो उजाला
फिर से भर दें जो रोशनियाँ
उसके आस-पास

इतवार चर्च की सीड़ियाँ उतरते
एक नन्हा हाथ थाम लेता
कलाई उसकी ..
लौट आता उसका
बचपन मुस्कुराता !

5 comments:

  1. इतवार चर्च की सीड़ियाँ उतरते
    एक नन्हा हाथ थाम लेता
    कलाई उसकी ..
    लौट आता उसका
    बचपन मुस्कुराता !........बहुत सुंदर पंक्तियाँ रची हैं आपने, जीवन संध्या की देहलीज़ पर खड़ी अनुभवी ऑंखें जब पाती हैं कोई नन्हा सहारा तो चमक उठती हैं प्रसन्नता से, मुझे पढ़कर मेरे दादाजी याद आ गए और नेत्र सजल हो उठे.......सुंदर और भावपूर्ण रचना के लिए बधाई......

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  3. Anju ji,
    Thanks for your valuable comments. Old age is inevitable reality, but can be cherished, as shown by our elders.

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  4. उम्र के इस पड़ाव को उचित शब्दों से रेखांकित किया है...!
    पकी उम्र के बचपन के प्रति संवेदनाएं जागे सभी के भीतर... आखिर सबको एक ही गति को प्राप्त होना है एक दिन!

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  5. Anupama ji,
    True..! Why not we have a happier version of life in different stages..
    Thanks a lot ..!

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