ज़िन्दगी इक रोज़नामचा ही रही !
कुछ आज नकद,
जो, बचा – सो कल उधार.
साँसें गिनीं, जो कम पड़ीं !
वो जैसे चले घड़ी,
फिर, निगाह – ऊपर उठी.
हिसाब चलता रहा,
मेहरबानी उसकी ही सही
ज़िन्दगी इक .. ..
मकर-संक्रांति, उत्तरायण व मगरविल्लकू (केरल) के पावन पर्व पर अनुपमा जी की यह पंक्तियाँ अति सुन्दर लगीं!
आप सभी तो इस लोक पर्व की बहुत शुभकामनायें ..